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रामपुर/80 वें स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर रामपुर रज़ा पुस्तकालय के निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र ने राष्ट्रीय ध्वज फहराकर राष्ट्रध्वज को सलामी दी।
इस अवसर पर निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र जी ने उपस्थित अधिकारियों एवं कर्मचारियों को संबोधित करते हुए स्वतंत्रता दिवस के महत्व, राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं देश के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन का संदेश दिया और कहा कि हम सब परिचित हैं कि कितने संघर्षों के बाद, कितने त्याग और बलिदान के बाद भारत स्वतंत्र हुआ। यह स्वतंत्रता हमें किसी ने थाली में सजाकर नहीं दी है। इसके लिए न जाने कितनी माताओं ने अपने बेटे खोए, कितने बच्चों ने अपने पिता खोए और कितनी सुहागिनों की माँग उजड़ी। जिस तरह हमारी प्रदर्शनी में जाकर कोई भी उस बलिदान की गाथा को देख सकता है और यह जान सकता है कि किस प्रकार एक ऐसा साम्राज्य, जिसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, उसको हमने इस देश से खदेड़ दिया। यह हमारे शौर्य का भी परिचय है और हमारे स्वाभिमान का भी परिचय है।
इसलिए इस बार की प्रदर्शनी के लिए हमने जो थीम रखी है, वह यही है—“संघर्ष से स्वतंत्रता तक, स्वतंत्रता से स्वाभिमान तक और स्वाभिमान से विकसित भारत तक।” इसमें हमारे संघर्ष की बात है, हमारी स्वतंत्रता की बात है, हमारे स्वाभिमान की भी बात है और आने वाले समय में जिस धरती पर हमने जन्म लिया, उसके भविष्य की भी बात है।
कोई भी समाज, कोई भी देश बिना त्याग के, बिना श्रम के, बिना बलिदान के खड़ा नहीं होता और स्वतंत्रता कोई ऐसी चीज़ नहीं है कि जो एक बार हमको मिल गई तो वह हमेशा बनी रहे। बहुत-सी शक्तियाँ भारत के भीतर भी और भारत के बाहर भी इस बात को लेकर निरंतर षड्यंत्र करती हैं कि भारत, जो एक स्थिर लोकतंत्र है, उसको अस्थिर कैसे किया जाए, इसको खंडों में बाँटकर इसके विभिन्न खंडों में किस प्रकार से अपना आधिपत्य जमाया जाए।
भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। विश्व की तेज़ी से उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। आज संपूर्ण धरा पर भारत के बिना या भारत को अपनी योजना में सम्मिलित किए बिना कोई भी वैश्विक कार्य संपन्न नहीं हो सकता है। इसलिए शक्तिशाली भारत, समृद्ध भारत, स्वाभिमानी भारत, एक ऐसा भारत जो अपना भविष्य स्वयं निर्मित कर सकता हैं—लोग देखना नहीं चाहते हैं।
ऐसी स्थिति में प्रत्येक नागरिक का इस देश के लिए यह दायित्व बनता है कि वह अपने भाषायी मतभेदों को भूलकर, अपने भूभागीय भेदों को भूलकर, अपने मज़हबी भेदों को भूलकर इस भारत की रक्षा में, इस भारत को आगे बढ़ाने में प्राणपण से जुटे। पाँच हजार साल पुरानी सभ्यता है भारत की। इसे न कोई मिटा सका है और जो दुस्वप्न देख रहे हैं इसे मिटाने का, वे भी इतिहास के कोने में स्थान तक न पाएँगे—यह हमें पूरा विश्वास है।
लेकिन स्वतंत्रता का प्रभाव पानी की तरह होता है। यदि हम किसी बर्तन में या किसी बाल्टी में, किसी गगरी में जल रखते हैं और उसके ढक्कन को ऊपर से ठीक से बंद भी कर देते हैं, लेकिन एक मामूली-सा छेद हो जाए, वह छेद इतना छोटा हो सकता है कि दिखाई भी न पड़े, तो वह सारा पानी बह जाएगा। कोई यत्न, कोई श्रम काम नहीं आएगा उसको बचाने के लिए। इसलिए यह सतर्कता बहुत आवश्यक है। हमें अपने पास, अगल-बगल, हर तरफ सतर्क रहना होगा।
और आज के इस सूचना के युग में जो युद्ध लड़े जा रहे हैं, वे मैदान पर तो लड़े ही जा रहे हैं, विश्व के अन्य भागों में भी, लेकिन सबसे बड़ा युद्ध नैरेटिव्स का है। और जो यह नैरेटिव्स का युद्ध है, यह विभ्रम फैलाने के लिए, भ्रमित करने के लिए किया जाता है या अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लोग इस प्रकार के नैरेटिव्स बनाते हैं, जिससे लोगों के मन में शंकाएँ पैदा हों, उनमें विभ्रम पैदा हो, उनमें मतभेद पैदा हों और वे अपने आप पर विश्वास खोकर फिर से पराधीन हो जाएँ।
हमें इन नैरेटिव्स से हर स्तर पर लड़ना है और आजकल सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत ज़्यादा बढ़ गया है। नैरेटिव्स को आगे बढ़ाने का काम सबसे अधिक अगर कहीं हो रहा है तो वह सोशल मीडिया पर हो रहा है। इसलिए भारत के प्रत्येक नागरिक का यह दायित्व है कि यह जो नया यंत्र आया है सोशल मीडिया के नाम पर, इस पर हम भारतपरस्त मनन या नैरेटिव को आगे कैसे बढ़ाएँ और वे नैरेटिव्स जो भारत के खंडन की दिशा में, भारत को कमजोर करने की दिशा में काम कर रहे हैं, उनका ठीक प्रकार से प्रत्युत्तर कैसे दें।
यही आज के समय का हमारा स्वतंत्रता संग्राम है, क्योंकि हमें अगर अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखना है तो सतर्कता के साथ हर प्लेटफॉर्म पर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी प्रयास, जो भारत को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है, वह सफल न हो।
रामपुर रज़ा पुस्तकालय विश्वप्रसिद्ध, एक स्वायत्त, राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है और इस राष्ट्रीय महत्व के स्वायत्त, विश्वप्रसिद्ध संस्थान की यह विश्वदृष्टि है कि चाहे वह सांस्कृतिक स्तर पर हो, चाहे वह भाषाई स्तर पर हो, चाहे वह विषयों के स्तर पर हो, हम अपनी दृष्टि को बहुत ही विस्तारपूर्वक और समन्वय रखते हैं, इनक्लूसिव रखते हैं। एक्सक्लूजन यानी ‘ही’ संस्कृति का, ‘ही’ मनीषा का हमारे यहाँ कोई स्थान नहीं है।
मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ कि चाहे वह परिवार हो, चाहे वह समाज हो, देश हो, दुनिया हो, मुख्य जो संघर्ष है वह ‘भी’ मनीषा और ‘ही’ मनीषा के बीच में होता है। यदि हम ‘ही’ मनीषा के शिकार हैं और यही कहें कि मेरी ही बात सही है, मेरा ही विचार सही है, मेरी ही उपासना पद्धति सही है, मेरा ही दर्शन सही है, मेरा ही सत्य सही है, तो यह संघर्ष को जन्म देता है, हिंसा को जन्म देता है और यह हम विश्व के कई देशों में आज देख रहे हैं। ऐसे युद्ध हो रहे हैं, जिनका अंत होने का कोई प्रकाश नहीं दिखाई पड़ता कि इनका कभी अंत भी होगा।
और इसका विकल्प है ‘भी’ मनीषा। मेरी भी भाषा सही, तुम्हारी भी भाषा सही; मेरा भूभाग, मेरा क्षेत्र भी सही, तुम्हारा क्षेत्र, तुम्हारा भूभाग भी सही; मेरी उपासना पद्धति भी सही, तुम्हारी उपासना पद्धति भी सही; मेरा मज़हब भी सही, तुम्हारा मज़हब भी सही; मेरा सत्य और दर्शन भी सही, तुम्हारा सत्य और दर्शन भी सही।
इस प्रकार से ‘भी’ मनीषा के साथ समन्वय करते हुए, जब हम एक-दूसरे के हित के विषय में, एक-दूसरे के परिष्कार और उत्कर्ष की दिशा में काम करेंगे, तो न केवल सुख, समृद्धि, शांति, सुरक्षा हमारे परिवार में आएगी, हमारे समाज में आएगी, हमारे देश में आएगी, बल्कि पूरी दुनिया में आएगी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य, जो कई बार अस्थिर दिखाई पड़ता है, वह सुखद होगा, वह समृद्ध होगा, वह सुरक्षित होगा, वह शांतिपूर्ण होगा।
रिपोर्टर परवेज़ अली रामपुर यूपी,,,9359324086
