Skip to content
By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
CENNEWSCENNEWSCENNEWS
  • होम पेज
  • मुंबई
  • राष्ट्रीय
  • जम्मू-कश्मीर
  • उत्तर प्रदेश
  • हमारे बारे में
  • संपर्क करें
Search
  • Advertise
© 2022 Foxiz News Network. Ruby Design Company. All Rights Reserved.
Reading: जब गेंद स्टिक से चिपक जाती थी, ऐसे थे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, जिनके नाम पर मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवसनीरज कुमार सिंह
Share
Sign In
Notification Show More
Font ResizerAa
CENNEWSCENNEWS
Font ResizerAa
  • About
  • Advertise
  • Careers
  • Contact
Search
  • About
  • Advertise
  • Careers
  • Contact
Have an existing account? Sign In
Follow US
  • Advertise
© 2022 Foxiz News Network. Ruby Design Company. All Rights Reserved.
CENNEWS > ब्लॉग > Sports > जब गेंद स्टिक से चिपक जाती थी, ऐसे थे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, जिनके नाम पर मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवसनीरज कुमार सिंह
Sports

जब गेंद स्टिक से चिपक जाती थी, ऐसे थे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, जिनके नाम पर मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवसनीरज कुमार सिंह

Last updated: August 29, 2026 9:02 pm
cennews
Share
12 Min Read
जब गेंद स्टिक से चिपक जाती थी, ऐसे थे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, जिनके नाम पर मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवसनीरज कुमार सिंह
जब गेंद स्टिक से चिपक जाती थी, ऐसे थे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, जिनके नाम पर मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवसनीरज कुमार सिंह
SHARE

जब गेंद स्टिक से चिपक जाती थी, ऐसे थे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, जिनके नाम पर मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवसनीरज कुमार सिंह

जब गेंद स्टिक से चिपक जाती थी, ऐसे थे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, जिनके नाम पर मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवस

खेल के मैदान पर कुछ नाम सिर्फ अपनी उपलब्धियों के लिए याद नहीं किए जाते, बल्कि वे पूरे खेल की पहचान बन जाते हैं। भारतीय हॉकी में मेजर ध्यानचंद ऐसा ही नाम हैं, जिनकी स्टिक और गेंद के बीच तालमेल देखकर दर्शकों को कई बार जादू का एहसास होता था। जिस दौर में भारत की हॉकी दुनिया के मैदानों पर अपना दबदबा कायम कर रही थी, उस दौर के सबसे बड़े नायकों में ध्यानचंद का नाम सबसे आगे था। 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक में भारत की लगातार तीन स्वर्ण पदक जीत में अहम भूमिका निभाने वाले ध्यानचंद ने अपनी असाधारण ड्रिब्लिंग, गेंद पर नियंत्रण और गोल करने की कला से दुनिया को भारतीय हॉकी की ताकत का परिचय कराया। 29 अगस्त 1905 को जन्मे ध्यानचंद की महान विरासत को याद करते हुए हर साल उनकी जयंती को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

प्रयागराज से शुरू हुई कहानी

ध्यानचंद (ध्यान सिंह) का जन्म 29 अगस्त 1905 को प्रयागराज में हुआ था। उनके पिता समेश्वर सिंह ब्रिटिश भारतीय सेना में थे और इसी कारण परिवार का जीवन अलग-अलग स्थानों पर बीता। बचपन में ध्यानचंद की हॉकी में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन किशोरावस्था में सेना में शामिल होने के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। वर्ष 1922 में वह भारतीय सेना में भर्ती हुए। यहीं उन्हें हॉकी को गंभीरता से सीखने और अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर मिला। सेना के अनुशासन ने उनके खेल को नई धार दी और मैदान पर उनकी पहचान तेजी से बनने लगी।

चांदनी रात में अभ्यास से पड़ा ‘चंद’ नाम

ध्यानचंद के नाम को लेकर एक मशहूर कहानी है। बताया जाता है कि सेना में भर्ती होने के बाद वह रात में चांदनी के दौरान हॉकी का अभ्यास किया करते थे। इसी वजह से उनके साथी उन्हें ‘चंद’ कहकर पुकारने लगे और आगे चलकर यही नाम उनकी पहचान बन गया। हालांकि इस प्रसंग के अलग-अलग संस्करण मिलते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि ध्यानचंद ने अपने खेल को निखारने के लिए असाधारण मेहनत की। उनकी सफलता के पीछे केवल प्राकृतिक प्रतिभा नहीं, बल्कि लगातार अभ्यास, अनुशासन और खेल की बारीकियों को समझने की क्षमता थी।

सेना ने दुनिया के महान खिलाड़ी को तराशा

भारतीय सेना में रहते हुए ध्यानचंद ने हॉकी में अपनी प्रतिभा का ऐसा प्रदर्शन किया कि वह जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने लगे। उनकी कलाई की ताकत, गेंद पर नियंत्रण और तेजी से दिशा बदलने की क्षमता उन्हें दूसरे खिलाड़ियों से अलग बनाती थी। वर्ष 1926 में वह भारतीय सेना की उस टीम के सदस्य बने जिसने न्यूजीलैंड का दौरा किया। इस दौरे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी प्रतिभा को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उनके करियर को नई दिशा मिली।

एम्सटर्डम ओलंपिक में दुनिया ने देखा जादू

1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक ने ध्यानचंद को विश्व हॉकी के मंच पर स्थापित कर दिया। भारत ने इस प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता और ध्यानचंद टीम के प्रमुख खिलाड़ियों में शामिल रहे। फाइनल में भारत ने नीदरलैंड्स को 3-0 से हराया। ध्यानचंद ने इस मुकाबले में दो गोल किए। उनके प्रदर्शन ने विदेशी दर्शकों और खिलाड़ियों को भी प्रभावित किया। गेंद को स्टिक से नियंत्रित करने की उनकी असाधारण क्षमता ने उन्हें दुनिया के महान हॉकी खिलाड़ियों की कतार में खड़ा कर दिया।

लॉस एंजिल्स में गोलों की बारिश

1932 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में भारतीय हॉकी का दबदबा और मजबूत हुआ। अमेरिका के खिलाफ भारत ने 24-1 से बड़ी जीत दर्ज की। इस मुकाबले में ध्यानचंद ने आठ गोल किए, जबकि उनके छोटे भाई रूप सिंह ने सात गोल दागे। यह मुकाबला भारतीय हॉकी के इतिहास के सबसे चर्चित मैचों में शामिल हो गया। भारत ने इस ओलंपिक में भी स्वर्ण पदक जीता और ध्यानचंद एक बार फिर टीम की सफलता के केंद्र में रहे।

बर्लिन में कप्तानी और जर्मनी पर ऐतिहासिक जीत

1936 का बर्लिन ओलंपिक ध्यानचंद के करियर का सबसे यादगार अध्याय माना जाता है। इस बार वह भारतीय टीम के कप्तान थे। भारत ने फाइनल तक पहुंचने के दौरान शानदार प्रदर्शन किया और निर्णायक मुकाबले में उसका सामना मेजबान जर्मनी से हुआ। फाइनल में भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराकर लगातार तीसरा ओलंपिक स्वर्ण पदक अपने नाम किया। ध्यानचंद ने इस मैच में भी शानदार प्रदर्शन किया और भारत की ऐतिहासिक जीत में अहम भूमिका निभाई।

गेंद स्टिक से चिपकने की कहानियां

ध्यानचंद के खेल को लेकर कई किस्से आज भी सुनाए जाते हैं। उनके ड्रिब्लिंग कौशल और गेंद पर नियंत्रण को देखकर दर्शक हैरान रह जाते थे। उनकी स्टिक से गेंद इतनी सहजता से नियंत्रित होती थी कि लोगों को लगता था कि गेंद स्टिक से चिपकी हुई है। यहां तक कि उनके बारे में यह कहानी भी प्रसिद्ध हुई कि उनकी स्टिक में कोई चुंबकीय शक्ति है। हालांकि ये बातें मुख्य रूप से उनके असाधारण खेल कौशल से जुड़ी लोकप्रिय किंवदंतियां थीं। वास्तविकता यह थी कि गेंद पर उनका नियंत्रण, टाइमिंग और ड्रिब्लिंग अपने दौर के दूसरे खिलाड़ियों से कहीं आगे था।

मैदान पर जादू, मैदान के बाहर सादगी

मेजर ध्यानचंद की महानता सिर्फ उनके गोल और उपलब्धियों तक सीमित नहीं थी। वह अपने शांत स्वभाव, अनुशासन और सादगी के लिए भी जाने जाते थे। वह व्यक्तिगत शोहरत के बजाय टीम की जीत को प्राथमिकता देते थे। उनके खेल में आक्रामकता थी, लेकिन व्यवहार में विनम्रता। यही वजह थी कि वह भारत के साथ-साथ दुनिया भर के हॉकी प्रेमियों के बीच सम्मानित हुए। उनका खेल उस दौर में भारतीय आत्मविश्वास का भी प्रतीक था, जब देश ब्रिटिश शासन के अधीन था। भारतीय टीम जब विदेशी धरती पर उतरती थी तो उसके प्रदर्शन के साथ देश की प्रतिष्ठा भी जुड़ी होती थी। ध्यानचंद और उनके साथियों ने मैदान पर जिस तरह अपना दबदबा कायम किया, उसने भारतीय खेल प्रतिभा की क्षमता को दुनिया के सामने रखा।

1,000 से अधिक गोल का करियर

ध्यानचंद के करियर को लेकर सबसे चर्चित आंकड़ा उनके 1,000 से अधिक गोल का है। वर्ष 1926 से 1948 तक फैले उनके लंबे खेल करियर में उन्होंने भारतीय हॉकी को गौरव के कई अवसर दिए। उनकी उपलब्धियों का सबसे बड़ा प्रमाण लगातार तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक हैं। 1928 में एम्सटर्डम, 1932 में लॉस एंजिल्स और 1936 में बर्लिन में भारत की जीत ने उन्हें हॉकी के इतिहास में अमर कर दिया।

खेल से संन्यास के बाद भी जारी रहा योगदान

मेजर ध्यानचंद ने सक्रिय खेल से संन्यास लेने के बाद भी हॉकी से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा। उन्होंने खिलाड़ियों को प्रशिक्षित किया और नई पीढ़ी को खेल की बारीकियां सिखाईं। उनका मानना था कि महान खिलाड़ी बनने के लिए केवल प्रतिभा पर्याप्त नहीं है, बल्कि लगातार अभ्यास और अनुशासन भी जरूरी है। उन्होंने अपने अनुभवों के जरिए भारतीय हॉकी को आगे बढ़ाने में योगदान दिया और उनकी विरासत बाद की पीढ़ियों के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनी।

1956 में पद्म भूषण से सम्मानित

भारत सरकार ने हॉकी में ध्यानचंद के योगदान को सम्मान देते हुए वर्ष 1956 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके शानदार खेल करियर और भारतीय खेलों में उनके योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता थी। आज भी उन्हें भारतीय हॉकी के महानतम खिलाड़ियों में गिना जाता है।

भारत रत्न की मांग और सर्वोच्च खेल सम्मान

ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग लंबे समय से होती रही है। वर्ष 2014 में केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि उनके नाम की भारत रत्न के लिए सिफारिश की गई थी, हालांकि उस समय उन्हें यह सम्मान देने का कोई प्रस्ताव सरकार के पास नहीं था। वर्ष 2021 में देश के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न का नाम बदलकर मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार कर दिया गया। यह फैसला भारतीय खेल जगत में ध्यानचंद की विरासत को मिली बड़ी राष्ट्रीय मान्यता के रूप में देखा गया।

29 अगस्त बना राष्ट्रीय खेल दिवस

ध्यानचंद की जन्मतिथि 29 अगस्त को भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देशभर में खेलों और खिलाड़ियों के योगदान को याद किया जाता है तथा राष्ट्रीय खेल पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। इस तरह ध्यानचंद का जन्मदिन केवल एक महान खिलाड़ी की जयंती नहीं, बल्कि भारत की खेल संस्कृति और खेल भावना का प्रतीक बन गया है।

3 दिसंबर 1979 को हुआ निधन

लंबे समय तक भारतीय खेल जगत को प्रेरित करने के बाद ध्यानचंद का निधन 3 दिसंबर 1979 को हुआ। वह दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनका नाम भारतीय हॉकी के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। उनकी उपलब्धियां और उनके खेल की कहानियां आज भी भारतीय खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

आज भी कायम है ‘हॉकी के जादूगर’ की पहचान

मेजर ध्यानचंद का जीवन इस बात का उदाहरण है कि महानता केवल रिकॉर्ड बनाने से नहीं आती, बल्कि खेल के प्रति समर्पण, अनुशासन, टीम भावना और देश के लिए खेलने की भावना से बनती है। उन्होंने जिस दौर में हॉकी के मैदान पर भारत का परचम लहराया, वह भारतीय खेल इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन गया। उनकी स्टिक से निकले गोलों की गूंज भले ही दशकों पुरानी हो गई हो, लेकिन उनका प्रभाव आज भी भारतीय हॉकी में महसूस किया जाता है। 29 अगस्त को जब देश राष्ट्रीय खेल दिवस मनाता है, तो उसके केंद्र में वही खिलाड़ी होता है जिसने दुनिया को दिखाया कि एक साधारण हॉकी स्टिक, असाधारण प्रतिभा और अटूट समर्पण के साथ इतिहास रच सकती है। ध्यानचंद के लिए हॉकी सिर्फ एक खेल नहीं थी, बल्कि भारत के गौरव को दुनिया के सामने रखने का माध्यम थी। यही वजह है कि वह आज भी भारतीय खेल जगत में ‘हॉकी के जादूगर’ के नाम से अमर हैं।

You Might Also Like

प्रज्ञानानंद ने रचा इतिहास, कारुआना को हराकर जीता पहला ग्रैंड चेस टूर खिताब

भारत-श्रीलंका दूसरा टेस्ट ड्रॉ, टीम इंडिया ने 1-0 से जीती टेस्ट सीरीज

स्कूलों में खेल को बढ़ावा देने की जरूरत, प्राथमिकताओं में बदलाव के कारण पीछे छूटा: हरि रंजन राव

भारत के खिलाफ श्रीलंका की पहली पारी लड़खड़ाई, लंच तक 4 विकेट पर 130 रन

भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स युवा और खेल मंत्रियों की दो दिवसीय बैठकें विशाखापत्तनम में होंगी

TAGGED: ऐसे थे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, जब गेंद स्टिक से चिपक जाती थी, जिनके नाम पर मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवसनीरज कुमार सिंह

Sign Up For Daily Newsletter

Be keep up! Get the latest breaking news delivered straight to your inbox.
[mc4wp_form]
By signing up, you agree to our Terms of Use and acknowledge the data practices in our Privacy Policy. You may unsubscribe at any time.
Share This Article
Facebook Twitter Copy Link Print
Share
Previous Article अरुण जेटली जी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अरुण जेटली जी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि
Next Article भारत-श्रीलंका दूसरा टेस्ट ड्रॉ, टीम इंडिया ने 1-0 से जीती टेस्ट सीरीज भारत-श्रीलंका दूसरा टेस्ट ड्रॉ, टीम इंडिया ने 1-0 से जीती टेस्ट सीरीज
Leave a comment Leave a comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Stay Connected

235.3kFollowersLike
69.1kFollowersFollow
11.6kFollowersPin
56.4kFollowersFollow
136kSubscribersSubscribe
4.4kFollowersFollow
- Advertisement -
Ad imageAd image

Latest News

पत्नी को लेने पहुंचा दामाद, थार से घर में मारी फ़िल्मी अंदाज़ मे टक्कर, बाद मे साले पर की फायरिंग में साला गंभीर।
ब्रेकिंग न्यूज़ रामपुर। मुरादबाद के बाद अब रामपुर मे आदमखोर तेंदुए का आतंक।
UP August 29, 2026
मुंबई APMC सब्जी मंडी में चौंकाने वाला मामला; कचरे से सब्जियां चुनकर दोबारा पैक करने का आरोप, उपभोक्ताओं की सेहत से खिलवाड़?
नवी मुंबई में कोयते का खौफ!
Mumbai August 29, 2026
रामपुर/ फर्जी जनता हेल्थ केयर अस्पताल में फर्जी झोलाछाप डॉक्टर ने पित्ते का किया ऑपरेशन स्वास्थ्य विभाग पर खडे हुए सवाल।
रामपुर के टांडा का युवक मोहम्मद सिराज को बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कथित तौर पर सोना तस्करी के मामले में पकड़ा गया है।
UP August 29, 2026
पत्नी को लेने पहुंचा दामाद, थार से घर में मारी फ़िल्मी अंदाज़ मे टक्कर, बाद मे साले पर की फायरिंग में साला गंभीर।
ब्रेकिंग न्यूज़ |रामपुर। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर रामपुर में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की खूबसूरत तस्वीर देखने को मिली।
UP August 29, 2026
CENNEWSCENNEWS
Follow US
© 2026 cennews.in. Designed by Adcraft India. All Rights Reserved.
  • Advertise
Join Us!

Subscribe to our newsletter and never miss our latest news, podcasts etc..

[mc4wp_form]
Zero spam, Unsubscribe at any time.
CEN News official Logo CEN News official Logo
Welcome Back!

Sign in to your account

Lost your password?