श्री गुरु तेग बहादुर जी का सर्वोच्च बलिदान मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता का जीवंत दीपस्तंभ : राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा
नवी मुंबई में ‘श्री गुरु तेग बहादुर जी का विरासत’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी; राज्य के किसी विश्वविद्यालय में ‘श्री गुरु तेग बहादुर चेयर’ स्थापित करने का राज्यपाल का आह्वान
नवी मुंबई।अन्य धर्मों के अनुयायियों की धार्मिक स्वतंत्रता और मानव गरिमा की रक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले श्री गुरु तेग बहादुर जी का जीवन और विचार केवल इतिहास की स्मृति नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतंत्र, सामाजिक सौहार्द और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए आज भी एक जीवंत दीपस्तंभ हैं। महाराष्ट्र के 65 सार्वजनिक एवं निजी विश्वविद्यालयों में से किसी एक विश्वविद्यालय में ‘श्री गुरु तेग बहादुर चेयर’ स्थापित की जानी चाहिए। यह चेयर अंतरधार्मिक संवाद, शोध, अध्यापन तथा विवेक और धार्मिक स्वतंत्रता के गुरुजी के संदेश के प्रचार-प्रसार का स्थायी केंद्र बनेगी। यह आह्वान महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने नवी मुंबई में किया।
श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहादत दिवस के अवसर पर सीबीडी बेलापुर स्थित पंजाब हेरिटेज भवन में ‘श्री गुरु तेग बहादुर जी का विरासत’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, साहित्य अकादमी नई दिल्ली तथा पंजाबी कल्चरल एंड वेलफेयर एसोसिएशन, नवी मुंबई के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में राज्यपाल ने उद्घाटन अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर महाराष्ट्र के वन मंत्री गणेश नाईक, विधायक मंदाताई म्हात्रे, नवी मुंबई महानगरपालिका की महापौर सुजाता पाटील, राज्यपाल के सचिव डॉ. प्रशांत नरनावरे, नवी मुंबई महानगरपालिका आयुक्त डॉ. कैलास शिंदे, कोकण विभागीय आयुक्त रुबल अग्रवाल, ठाणे जिलाधिकारी डॉ. श्रीकृष्ण पांचाल, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक, उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा, हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के अध्यक्ष डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, साहित्य अकादमी के सचिव वरुण गुलाटी, तख्त श्री अबचल नगर हुजूर साहिब के प्रशासक विजय सतबीर सिंह सहित साहित्यकार, विद्वान और सिख समाज के गणमान्य लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
महाराष्ट्र-पंजाब के सांस्कृतिक रिश्ते का किया उल्लेख
राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने अपने संबोधन की शुरुआत महाराष्ट्र और पंजाब के सदियों पुराने आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख करते हुए की। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र संतों की पवित्र भूमि है। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम और संत एकनाथ की इस भूमि से संत नामदेव महाराज भक्ति का संदेश लेकर पंजाब पहुंचे थे। उनकी पवित्र रचनाएं आज भी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मानपूर्वक विद्यमान हैं।उन्होंने कहा कि बाद में श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराष्ट्र के नांदेड पहुंचे और वहां स्थापित तख्त श्री हजूर साहिब दोनों राज्यों के अनूठे सांस्कृतिक संबंधों का प्रमाण है। महाराष्ट्र और पंजाब समान मूल्यों, आदर्शों और साहस की परंपरा को संजोने वाले ‘जुड़वां राज्य’ हैं।
‘हिंद दी चादर’ बनकर दिया सर्वोच्च बलिदान
राज्यपाल ने कहा कि वर्ष 1675 में श्री गुरु तेग बहादुर जी द्वारा दिया गया सर्वोच्च बलिदान भारत के नागरिक और सांस्कृतिक इतिहास का अत्यंत अद्वितीय एवं प्रेरणादायी अध्याय है। उन्होंने केवल अपने अनुयायियों के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को बिना भय अपने धर्म का पालन करने के अधिकार की रक्षा के लिए बलिदान दिया। इसी कारण उन्हें ‘हिंद दी चादर’ के रूप में सम्मानित किया जाता है।उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्यों को गुरुजी ने सदियों पहले अपने जीवन और कार्यों के माध्यम से चरितार्थ किया था। आज सामाजिक और मानसिक तनाव के दौर में गुरुजी की शिक्षाएं समाज को आंतरिक शक्ति, विनम्रता, करुणा और निस्वार्थ सेवा की दिशा दिखाती हैं।
*विश्वविद्यालयों में स्थायी अध्ययन केंद्र बनाने की जरूरत*
राज्यपाल ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी के विचारों को केवल संगोष्ठियों और कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों तक उनके विचार पहुंचाने के लिए संस्थागत स्तर पर प्रयास आवश्यक हैं। इसी उद्देश्य से महाराष्ट्र के 65 सार्वजनिक एवं निजी विश्वविद्यालयों में से किसी एक में ‘श्री गुरु तेग बहादुर चेयर’ स्थापित की जानी चाहिए।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह चेयर अंतरधार्मिक संवाद, शोध और अध्यापन के साथ-साथ धार्मिक एवं वैचारिक स्वतंत्रता के गुरुजी के संदेश को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
