सवर्ण आरक्षण: राज्यसभा में संख्याबल कम लेकिन सरकार आश्वस्त, जानें क्या है गणित

सामान्य वर्ग को दस फीसदी आरक्षण देने वाले संविधान संशोधन विधेयक (Upper Caste Reservation Bill) को पारित कराने में सरकार की असल परीक्षा आज (बुधवार) को राज्यसभा (Rajyasabha) में होगी।

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सामान्य वर्ग को दस फीसदी आरक्षण देने वाले संविधान संशोधन विधेयक (Upper Caste Reservation Bill) को पारित कराने में सरकार की असल परीक्षा आज (बुधवार) को राज्यसभा (Rajyasabha) में होगी। सरकार को आशंका है कि सपा (SP), बसपा (BSP), राजद समेत कुछ दल कुछ मुश्किलें जरूर खड़ी कर सकते हैं। लेकिन इस बात को लेकर सरकार आश्वस्त है कि विधेयक पर होने वाले मतदान का ये दल विरोध नहीं कर पाएंगे। क्योंकि कोई भी दल सवर्णों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगा।

आम चुनावों से ठीक पूर्व सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण के कदम के नफा-नुकसान को सभी दल समझ रहे हैं। आरक्षित जातियों के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियां भी महसूस कर रही हैं कि भाजपा ने यह कदम उठाकर चुनाव में अपनी कई सीटें पक्की कर ली हैं। लेकिन ये दल समय-समय पर सवर्ण वोटों की खातिर आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातियों को आरक्षण की मांग करती रही हैं। इसलिए वह अब भी समर्थन कर रही हैं। सपा-बसपा ने इसका समर्थन करते हुए एससी/एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग की है। करीब-करीब ऐसी ही मांग राजद ने भी की है। तृणमूल कांग्रेस का रुख करीब-करीब कांग्रेस जैसा है, वह कहती है कि सरकार पहले नौकरियां बढ़ाए।

इसी प्रकार वामपंथी दल भी आर्थिक रूप से कमजोरों को आरक्षण का समर्थन करते हैं लेकिन इसे लागू करने के तौर-तरीकों और आय की सीमा का विरोध कर रहे हैं। कुछ दलों- बीजेडी, टीआरएस, टीडीपी आदि ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। तमिलनाडु में जहां आरक्षण 69 फीसदी तक पहुंच चुका है, वहां की प्रमुख पार्टी अन्नाद्रमुक, द्रमुक और अन्य दल भी अभी अपना मत स्पष्ट नहीं कर पाए हैं। राज्यसभा में अन्नाद्रमुक के 13 सांसद हैं। मोटे तौर पर पार्टी की तरफ से अभी तक यही बयान आया है कि वह इसे संविधान की भावना के अनुरूप नहीं मानती है, क्योंकि संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान नहीं है। लेकिन यह तर्क इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि अब संविधान में ही संशोधन हो रहा है। इसलिए विरोध का कोई ठोस आधार नहीं बनता है।्र

सत्तापक्ष को असल चिंता सपा-बसपा के रुख को लेकर है। सीबीआई छापों को लेकर सपा कई दिन से सदन नहीं चलने दे रही है। बसपा, उसका साथ दे रही है। सपा के 13 और बसपा के 4 सांसद हैं। अगर यह विरोध प्रदर्शन बुधवार को भी जारी रहा तो सरकार को असल दिक्कत सदन को सुचारू करने में मुश्किल होगी।

कांग्रेस ने हालांकि विधेयक का लोकसभा में समर्थन किया है और संसद के बाहर भी समर्थन किया है। इसलिए उम्मीद है कि राज्यसभा में भी उसका रुख स्पष्ट रहेगा। लेकिन सरकार की यह आशंका खत्म नहीं हुई है कि तीन तलाक विधेयक की तरफ कांग्रेस इस मामले को कहीं किसी और बहाने मसलन विमर्श के लिए समिति को भेजने आदि कारण से राज्यसभा में न अटका दे।

ये है राज्यसभा की स्थिति
राज्यसभा में 244 सांसद हैं। सरकार को इसे पारित करने के लिए दो तिहाई यानी 163 सांसदों का समर्थन चाहिए। एनडीए सांसदों की संख्या 100 से नीचे ही है। कांग्रेस के 50 सांसद हैं। आप, तृणमूल समेत कुछ दलों ने समर्थन का ऐलान किया है। इस प्रकार सबकुछ ठीकठाक चला तो विधेयक के पारित होने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

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