समलैंगिकों की हुई जीत… अब उठा सवाल- क्या शादी कर पाएंगे LGBT?

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भारत में दो व्यस्क लोगों के बीच समलैंगिक संबंध अब अपराध नहीं हैं.समलैंगिकता को अवैध बताने वाली IPC की धारा 377 की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम फैसला सुना दिया है. जिसके बाद भारत में दो वयस्क लोगों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंध अब अपराध नहीं रहे हैं, लेकिन समलैंगिकों की इस ऐतिहासिक जीत के बाद एक सवाल उठ रहा है ‘क्या अदालत के फैसले के भारत में समलैंगिक अब शादी कर पाएंगे’ ?

बता दें, भारत में सरकार, RSS और तमाम संगठन समलैंगिकों की शादी के विरोध में खड़े हैं. वहीं आज भी कई ऐसे देश मौजूद हैं जो समलैंगिक शादियों को मान्यता दे चुका है.

इनमें बेल्जियम, कनाडा, स्पेन, दक्षिण अफ्रीका, नॉर्वे, स्वीडन, आइसलैंड, पुर्तगाल, अर्जेंटीना, डेनमार्क, उरुग्वे, न्यूजीलैंड, फ्रांस, ब्राजील, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, लग्जमबर्ग, फिनलैंड, आयरलैंड, ग्रीनलैंड, कोलंबिया, जर्मनी और माल्टा देश शामिल हैं.

वहीं नीदरलैंड ने सबसे पहले दिसंबर 2000 में समलैंगिक शादियों को कानूनी तौर से सही करार दिया था.

आपको बता दें, साल 2015 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक शादियों को वैध करार दिया था. हालांकि, 2001 तक 57 फीसदी अमेरिकी लोग इसका विरोध करते थे.

प्यू रिसर्च के मुताबिक, 2017 में 62 फीसदी अमेरिकी इसका समर्थन करते हैं. वहीं, दुनिया के 26 देश ऐसे हैं जो समलैंगिकता को कानूनन सही करार दे चुके हैं.

साल 2017 में ऑस्ट्रेलिया में जब समलैंगिक शादियों के खिलाफ वोट कराया गया तो उस समय 150 सदस्यों के संसद में सिर्फ 4 सदस्यों ने दियों के खिलाफ वोट किया था.

RSS शादी के खिलाफ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया स्वागत किया है, लेकिन साथ में यह भी कहा है कि इस तरह के संबंध अप्राकृतिक हैं और भारतीय समाज ऐसे संबंधों को मान्यता नहीं देता. इसी के साथ उन्होंने कहा कि इनकी ‘शादी’ अप्राकृतिक है.

आपको बता दें, समलैंगिकों को आम बोलचाल की भाषा में एलजीबीटी (LGBT) यानी लेस्ब‍ियन (LESBIAN ), गे(GAY), बाईसेक्सुअल (BISEXUAL) और ट्रांसजेंडर (TRANSGENDER) कहते हैं. वहीं कई और दूसरे वर्गों को जोड़कर इसे क्व‍ियर (Queer) समुदाय का नाम दिया गया है.

जानें क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने: व्यक्तिगत चॉइस का सम्मान देना होगा, समलैंगिकों को राइट टु लाइफ उनका अधिकार है और यह सुनिश्चित करना कोर्ट का काम है, LGBT समुदाय को उनके यौनिक झुकाव से अलग करना उन्हें उनके नागरिक और निजता के अधिकारों से वंचित करना है, एलजीबीटी समुदाय को औपनिवेशिक कानून के जंजाल में नहीं फंसाया जाना चाहिए, गे, लेस्बियन, बाय-सेक्सुअल औऱ ट्रांसजेंडर सबके लिए नागरिकता के एक समान अधिकार हैं.

आपको बता दें, जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने कहा कि यह फैसला संसद द्वारा पारित मेंटल हेल्थकेयर एक्ट पर आधारित है. इस अधिनियम में संसद ने कहा कि समलैंगिकता मानसिक विकार नहीं है.

आजादी जैसा जश्न: वयस्क समलैंगिकता को धारा 377 से बाहर किए जाने के फैसले के बाद कई राज्यों में एलजीबीटी समुदाय के लोगों ने खुशी मनाई है, समलैंगिकों का कहना है कि फैसले के बाद हम खुश हैं. अब हम अपने समाज में बिना किसी डर के रह सकते हैं. आज बिल्कुल वैसी ही खुशी महसूस हो रही है जो साल 1947 में मिली आजादी के वक्त लोगों को महूसस हुई होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों को पक्ष में भले ही ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है लेकिन भारत में समलैंगिक जोड़ा क्या अपनी मर्जी से शादी कर पाएगा?

जानें-क्या है धारा 377- अंग्रेजों ने 1861 में धारा-377 भारत में लागू किया था. इस कानून के तहत अप्राकृतिक यौन संबंध (जैसे- अगर कोई व्यक्ति किसी महिला, पुरुष अथवा जानवर) के साथ अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध बनाता है तो उसे उम्रकैद या दस साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है. साल 1860 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने भारतीय दंड संहिता में धारा 377 को शामिल किया और उसी वक्त इसे भारत में लागू कर दिया गया. 1861 में डेथ पेनाल्टी का प्रावधान भी हटा दिया गया. 1861 में जब लॉर्ड मेकाले ने इंडियन पीनल कोड यानी आईपीसी ड्राफ्ट किया तो उसमें इस अपराध के लिए धारा 377 का प्रावधान किया गया.

इन देशों में गुनाह है ‘समलैंगिकता- भारत में समलैंगिकता अब अपराध नहीं है. लेकिन आज भी ऐसे देश हैं जहां इसे घोर अपराध माना जाता है और समलैंगिकों को मौत तक की सजा दे दी जाती है.

दुनिया में कुल 13 देश ऐसे हैं जहां गे सेक्स को लेकर मौत की सजा देने का प्रावधान है. इंडोनेशिया सहित कुछ देशों में गे सेक्स के लिए कोड़े मारने की सजा दी जाती है. वहीं अन्य देशों में भी इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया है और जेल की सजा दी जाती है.

सुडान, ईरान, सऊदी अरब, यमन में समलैंगिक रिश्ता बनाने के लिए मौत की सजा दी जाती है. सोमालिया और नाइजीरिया के कुछ हिस्सों में भी इसके लिए मौत की सजा का प्रावधान है.

धारा 377 के तहत क्राइम ही माने जाएंगे ये एक्ट: आपको  बता दें, सुप्रीम कोर्ट के ‘समलैंगिकता वैध’ के इस आदेश के बाद धारा 377 को पूरी तरह से खत्म नहीं किया गया है. इसमें समझने वाली बात ये है कि धारा 377 में सिर्फ दो वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंध ही नहीं बल्कि अन्य कई मसले भी आते हैं. IPC की धारा 377 को तहत समलैंगकिता को अपराध माना गया था. इसके तहत कई तरह के संबंधों को अपराध माना गया था. इसके तहत दो समान लिंगों वाले व्यक्ति अगर संबंध बनाते हैं तो वह अपराध होगा. इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति पशुओं या बच्चों के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाता है तो वह भी अपराध होगा. यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और यह गैर जमानती भी है.

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