‘वे मुझे वेश्या भी कहेंगे तो फ़र्क़ नहीं पड़ेगा’

''आज हम किससे लड़ने जा रहे हैं?'' गौरी लंकेश की पत्रकार दोस्त जब सुबह उन्हें फ़ोन करती थीं तो अक्सर यही सवाल पूछती थीं. ''आपकी शिकायत किससे है?''

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लंकेश अक्सर अपने संपादक से पूछती थीं कि उनके अख़बार ने उन मुद्दों को लेकर मजबूत रुख क्यों नहीं अपनाया जो उनके दिल के क़रीब है. ”अगर आप प्रभावी लोग ठोस क़दम नहीं उठा सकते तो हम इसे कैसे करेंगे?” गौरी लंकेश एक निर्भीक आवाज़ थीं जिसे ख़ामोश कर दिया गया.

दक्षिण भारत के जिस शहर बंगलुरू में वह रहती थीं वहीं से वो अपने नाम से ही एक साप्ताहिक टेब्लॉयड निकालती थीं. यह टेब्लॉयड कन्नड़ भाषा में निकलता है जो उन्हें पिता से विरासत में मिला था.

इसे वह पाठकों के चंदे से चलाती थीं. यह कर्नाटक की संस्कृति पर आधारित एक एक्टिविस्ट टेब्लॉयड है जिसमें विज्ञापन नहीं छपता है.

लंकेश की पहचान एक मजबूत वामपंथी विचारक के रूप में थी. उनका विचार संपादकीय में भी साफ़ दिखता था. लंकेश दक्षिणपंथी हिन्दुवादी विचारधारा पर जमकर बरसती थीं. उनका मानना था कि धार्मिक और बहुसंख्यकवाद की राजनीति भारत को तोड़ देगी.

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