नहीं रहे वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर, 14 भाषाओं में छपते थे कॉलम

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वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार कुलदीप नैयर नहीं रहे. पत्रकारिता जगत में कई सालों तक सक्रिय रहने के साथ राज्यसभा सांसद रह चुके नैयर अपने लेखन के अलावा विश्वशांति हेतु अपनी सक्रियता के लिए भी जाने जाते हैं. वे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और शांति कार्यकर्ता भी थे. आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कई प्रमुख बातें…

वे भारत सरकार के प्रेस सूचना अधिकारी के पद पर कई साल तक कार्य करने के बाद वे समाचार एजेंसी यूएनआई, पीआईबी, ‘द स्टैट्समैन’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे. वे पच्चीस सालों तक ‘द टाइम्स’ लंदन के संवाददाता भी रहे.

आपातकाल में नैयर- उन्हें 1975 से 77 में लगी इमरजेंसी को लेकर भी जाना जाता है. इस दौरान प्रशासन की ज्यादतियों के खिलाफ उन्होंने विरोध प्रदर्शन कर रहे समूह का नेतृत्व किया. आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (मीसा) के तहत वे जेल भी गए. उन दिनों, आपातकाल के समय वे उर्दू प्रेस रिपोर्टर थे.

पत्रकारिता क्षेत्र में काम करने के साथ वे 1996 में संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत के प्रतिनिधिमंडल सदस्य थे. 1990 में उन्हें ग्रेट ब्रिटेन में उच्चायुक्त नियुक्त किया गया और अगस्त 1997 में राज्यसभा में नामांकित किया गया.

उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं, जिसमें बिटवीन द लाइन्स, डिस्टेंट नेवर: ए टेल ऑफ द सब कॉन्टीनेंट, वॉल एट वाघा, इंडिया पाकिस्तान रिलेशनशिप आदि शामिल है. साथ ही 80 से अधिक समाचार पत्रों के लिए 14 भाषाओं में कॉलम और ओप-एड लिखते रहे.

उन्हें नॉर्थवेस्ट यूनिवर्सिटी की ओर से ‘एल्यूमिनी मेरिट अवार्ड’ (1999), रामनाथ गोयनका लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, सिविक पत्रकारिता के लिए प्रकाश कार्डले मेमोरियल अवार्ड (2014), सिविक पत्रकारिता के लिए प्रकाश कार्डले  मेमोरियल अवार्ड (2013) से भी सम्मानित किया गया था.

उन्हें अनुभवी भारतीय पत्रकार, सिंडिकेटेड स्तंभकार, मानव अधिकार कार्यकर्ता और लेखक, राजनीतिक कमेंटेटर के रूप में उनके लंबे कैरियर में उल्लेखनीय योगदान के लिए याद किया जाएगा.

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