चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव: विपक्ष के नोटिस पर 64 सांसदों के हस्ताक्षर

महाभियोग प्रस्ताव के पक्ष में पहले टीएमसी और डीएमके भी थीं, लेकिन बाद में इन्होंने कांग्रेस से किनारा कर लिया।

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नई दिल्ली. कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाना चाहते हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस के नेताओं ने शुक्रवार को उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू से मुलाकात की और प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया। इस नोटिस पर सात दलों के 64 मौजूदा सांसदों के दस्तखत हैं। अगर यह नोटिस मंजूर होता है और विपक्ष प्रस्ताव लाने में कामयाब हो जाता है तो देश के इतिहास में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ विधायिका की तरफ से यह ऐसा पहला कदम होगा। उधर, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इस मुद्दे पर खुलकर हो रही नेताओं की बयानबाजी को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।

विपक्ष के नोटिस पर 64 सांसदों के हस्ताक्षर
– राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा- हमने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया है। हमने संविधान के अनुच्छे 270 और 124 के तहत प्रस्ताव का नोटिस दिया है। हमने इसके लिए पांच आधार बताए हैं। राज्यसभा के सभापति 50 सांसदों के समर्थन पर भी फैसला कर सकते हैं। हमने 71 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस दिया है। इनमें से 7 का कार्यकाल खत्म हो चुका है। लिहाजा, संख्या 64 सांसदों की है।

हम नहीं चाहते थे कि ये दिन देखना पड़े
– कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने उपराष्ट्रपति से मुलाकात के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “देश जरूर जानना चाहेगा कि हमने क्यों ये कदम उठाया? हम भी नहीं चाहते थे कि ये दिन देखना पड़े। न्यायपालिका से सर्वोच्च स्तर की ईमानदारी की अपेक्षा होती है। सुप्रीम कोर्ट के जजों के बीच अंदरूनी कलह है। चार सीनियर जजों ने 12 जनवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसमें उन्होंने सार्वजनिक तौर पर चीफ जस्टिस के तौर-तरीकों के बारे में बात की थी।”
– सिब्बल ने कहा, “जजों ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ऑर्डर में नहीं है। चीफ जस्टिस को सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए।”

– “सुप्रीम कोर्ट के जज खुद यह कह रहे हैं कि न्यायपालिका की आजादी खतरे में हैं। ऐसे में क्या देश को कुछ नहीं करना चाहिए और खाली हाथ बैठे रहना चाहिए?”

50 सांसदों का समर्थन होने पर लाया जा सकता है महाभियोग प्रस्ताव
– हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए राज्यसभा के कम से कम 50 और लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है।
– अगर राज्यसभा के सभापति को यह प्रस्ताव सौंप दिया जाता है तो फिर वे उसके गुणदोष पर विचार करते हैं।
– अगर सभापति को यह लगता है कि प्रस्ताव लाने जैसा है तो वे एक कमेटी बनाते हैं, जो इस पर अागे विचार करती है। अन्यथा वे इसे खारिज भी कर सकते हैं।

7 दलों का साथ, तृणमूल और द्रमुक ने कांग्रेस से किया किनारा

– न्यूज एजेंसी के मुताबिक, महाभियोग प्रस्ताव लाना चाह रहे विपक्षी दलों में कांग्रेस के अलावा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और मुस्लिम लीग शामिल हैं।
– इससे पहले, इन सभी दलों ने संसद भवन में बैठक कर महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा की।
– हालांकि, महाभियोग प्रस्ताव के पक्षधर विपक्षी दलों में पहले तृणमूल कांग्रेस और द्रमक भी शामिल थीं। लेकिन बाद में इन दोनों दलों ने कांग्रेस से किनारा कर लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- महाभियोग पर बयानबाजी दुर्भाग्यपूर्ण

– सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने शुक्रवार को एक मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि महाभियोग के बारे में सार्वजनिक रूप से दिए जा रहे बयानों से शीर्ष अदालत व्यथित है। सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक रूप से हो रही चर्चा को काफी दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।
– सुप्रीम कोर्ट ने एटॉर्नी जनरल केके वेणुगाेपाल से इस बारे में अदालत की मदद करने को कहा। कोर्ट ने पूछा कि क्या महाभियोग पर बयानबाजी को रोका जा सकता है? कोर्ट ने कहा कि एटॉर्नी जनरल की सलाह के बाद ही मीडिया पर बंदिशें लगाने के बारे में सोचा जाएगा।

– दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के सामने एक याचिकाकर्ता ने यह मुद्दा उठाया कि जजों के महाभियोग के बारे में नेता खुलकर बयानबाजी कर रहे हैं।

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