कोहरा- बाढ़ नहीं, फिर क्यों लेट हैं ट्रेनें? सरकार का जवाब- दुर्घटना से देर भली

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देश में इस समय ना तो कोहरा पड़ रहा है और ना ही कहीं पर बाढ़ आई हुई है लेकिन इन सबके बावजूद रेलगाड़ियां देरी से चल रही हैं जिसके चलते देश भर में यात्री परेशान हैं. अमूमन जब ट्रेनों की लेटलतीफी की बात की जाती है तो रेल मंत्रालय कोहरे या बाढ़ की बात कह देता है. इसके अलावा देशभर में कहीं पर भी किसान आंदोलन या कोई दूसरा आंदोलन भी नहीं चल रहा है जिसकी वजह से रेल परिचालन बाधित हो. लेकिन इन सबके बाद भी लंबी दूरी की ट्रेनें घंटों देरी से चल रही हैं. उनके गंतव्य पर पहुंचने का कोई समय भी निर्धारित नहीं है. रेल मंत्रालय के आंकड़ों की बात करें तो आंकड़े भी यहीं कहते हैं कि रेलवे का टाइम टेबल ही बिगड़ चुका है.

2016-17 के दौरान रेलवे मेल-एक्सप्रेस के समय पर पहुंचने का औसत 76 फीसदी रहा था यानी 76 फीसदी ट्रेनें टाइम पर चली थीं. वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान मेल-एक्सप्रेस की समय पर पहुंचने की औसतन दर घटकर 71.38 फीसदी रह गई. यानी स्थिति सुधरने की बजाय और बिगड़ गई. अगर पैसेंजर ट्रेनों की बात करें तो वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान समय पर पहुंचने की औसतन दर 76.53 फीसदी रही जो वर्ष 2017-18 में गिरकर 72.66 फीसदी रह गई.

इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर मोदी सरकार का फोकस

रेल मंत्रालय के डायरेक्टर (इंफॉर्मेशन एंड पब्लिसिटी) वेदप्रकाश का कहना है कि मोदी सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने पर पूरा जोर लगाया हुआ है. उन्होंने बताया कि 2009-2014 के दौरान रेलवे में हर साल 24,307 करोड़ रुपये का निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर में किया गया. मोदी सरकार आने के बाद 2014-15 में 58,718 करोड़ रुपये का भारी निवेश रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में किया गया. वित्त वर्ष 2015-16 में रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश को बढ़ाकर 93,520 करोड़ रुपये पर पहुंचा दिया गया. जबकि वित्त वर्ष 2016-2017 के दौरान रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाकर 1,09,935 करोड़ रुपये पर पहुंच गया.

वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश का टारगेट 1,46,500 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है. वेदप्रकाश के मुताबिक देशभर में रेलवे के दोहरीकरण विद्युतीकरण और आधुनिकीकरण का काम काफी तेजी से चल रहा है. इंफ्रास्ट्रक्चर में हो रहे काम की वजह से भी रेलवे की आवाजाही पर असर पड़ा है. उनका कहना है कि 2019 तक डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर काम करना शुरू कर देगा तो उसके बाद मालगाड़ियों का दबाव मौजूदा लाइनों से हट जाएगा. इससे रेलगाड़ियों को तेजी से और समय पर चलाया जा सकेगा.

पूरे देश में रेलवे में सेफ्टी को तरजीह

रेलवे की प्रीमियम ट्रेनें शताब्दी और राजधानी तक 2 घंटे से लेकर 6 घंटों की देरी से चल रही हैं. ट्रेनें भले ही लेट चल रही हों लेकिन रेलवे का कहना है कि दुर्घटना से देर भली. जी हां, सड़क परिवहन में सुरक्षा के लिए कहे जाने वाले सूक्ति वाक्य को रेलवे ने अपना तकिया कलाम बना लिया है. वेदप्रकाश का कहना है कि इस समय जल्दी पहुंचने से ज्यादा जरूरी है सुरक्षित पहुंचना. उन्होंने बताया कि पूरे देश में रेलवे में सेफ्टी को तरजीह दी जा रही है. जिन-जिन रेल लाइनों और स्टेशनों पर मरम्मत और सेफ्टी के काम बकाया थे उनको बड़ी तेजी से पूरा किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि अब रेल मंत्रालय का पूरा फोकस सेफ्टी पर है. जगह-जगह पर ट्रैफिक ब्लॉक लेकर सेफ्टी और मरम्मत के काम को पूरा किया जा रहा है.

रेल मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016-17 के दौरान रेलवे ने सेफ्टी का काम करने के लिए 1,59,000 घंटों का ट्रैफिक ब्लॉक लिया था. वर्ष 2017-18 के दौरान रेलवे ने सेफ्टी और मरम्मत के काम को पूरा करने के लिए 1,89,000 घंटों का ट्रैफिक ब्लॉक लिया है. चालू वित्त वर्ष में देश के कई इलाकों में ट्रैफिक ब्लॉक लेकर सेफ्टी से संबंधित कामों को तेजी से पूरा किया जा रहा है. रेलवे के उच्च अधिकारियों के मुताबिक खतौली रेल हादसे के बाद मैकेनिकल विभाग को ब्लॉक देने से मना करने की हिम्मत अब कोई भी रेलवे अधिकारी नहीं कर पा रहा है.

ट्रेनों को समय पर पहुंचाना प्राथमिकता नहीं

रेल मंत्री पीयूष गोयल और रेलवे बोर्ड चेयरमैन अश्विनी लोहानी ने रेलवे के सेफ्टी से संबंधित तमाम कामों को जल्द से जल्द पूरा करने के निर्देश जारी कर दिए हैं. ऐसे में ट्रेनों को टाइम पर पहुंचाना प्राथमिकता नहीं रह गई है. इन सबके बीच एक बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि मोदी सरकार की तरफ से रेल मंत्रालय को स्पष्ट निर्देश हैं कि भले ही ट्रेनें देर से चलें लेकिन रेल हादसों को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है.

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