इसलिए फ्रंटफुट पर यूएई कर रहा है केरल में बाढ़ पीड़ितों की मदद

यूएई और अन्य खाड़ी देशों के सहारे चीन समेत भारत और अन्य एशियाई देशों ने तेज गति से अपना इंडस्ट्रिलाइजेशन किया. इसके साथ ही खाड़ी देश भारतीय नागरिकों के लिए रोजगार का एक अहम ठिकाना बनकर उभरा. विश्व बैंक के ताजे आंकड़ों के मुताबिक यूएई और अन्य खाड़ी देशों से रेमिटेंस के तौर पर 2017 में भारत को 69 बिलियन डॉलर मिले हैं.

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भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक क्षेत्रों में बेहद गहरा संबंध है. दोनों देशों के बीच इस संबंध को 1966 में तब और मजबूत किया गया जब शेख जाएद बिन सुल्तान अल नाहयान ने अबू धाबी की बागडोर अपने हाथ में ली. इसके बाद 1971 में संयुक्त अरब अमीरात फेडरेशन की नींव रखी गई. दोनों देशों के बीच एक साल के अंदर राजनयिक रिश्ते स्थापित हुए. 1972 में यूएई ने भारत में और 1973 में भारत ने यूएई में अपनी-अपनी एम्बेसी खोली.

गौरतलब है कि यूएई उन तेल समृद्ध खाड़ी देशों में शामिल हैं जिन्हें बीते कई दशकों से कच्चे तेल की कमाई का बड़ा फायदा मिला है. इस फायदे का सीधा असर यहां तेल कंपनियों समेत अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को  होता है. तेल की अकूत कमाई के चलते ज्यादातर खाड़ी देशों में इनकम टैक्स का प्रावधान नहीं है. लिहाजा यहां नौकरी करने वालों को टैक्स फ्री इनकम होती है.

इन देशों में किसी चीज को खरीदने में भी किसी तरह के टैक्स का प्रावधान नहीं है. यानी कार, मकान, घरेलू उत्पाद समेत ज्यादातर सेवाएं इन देशों में बेहद सस्ते दर पर उपलब्ध है. ऐसे में यूएई में नौकरी करने वालों की उनके वार्षिक इनकम में एक बड़ी बचत भी होती है. इसी खासियत के चलते यूएई समेत ज्यादातर खाड़ी देशों में आसपास के देशों से बड़ी संख्या में काम करने वाले पहुंचते हैं. इनमें बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक भी शामिल हैं.

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अंग्रेजी अखबार मिली गैजेट पर प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक खाड़ी देशों की कुल जनसंख्या में लगभग 31 फीसदी भारतीय नागरिक हैं. कुवैत में कुल जनसंख्या में 21.5 फीसदी भारतीय हैं तो वहीं ओमान में लगभग 54 फीसदी भारतीय मागरिक हैं. सउदी अरब में कुल जनसंख्या में 25.5 फीसदी भारतीय हैं तो वहीं संयुक्त अरब अमीरात में 41 फीसदी भारतीय है. लिहाजा, साफ है कि यूएई में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक मौजूद हैं जो वहां नौकरी कर रहे हैं.

खास बात है कि इन देशों में अच्छी संख्या में यूरोपीय देशों और रूस के भी नागरिक हैं. आर्थिक जानकारों का मानना है किद्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन खाड़ी देशों का वैश्विक अर्थव्यवस्था में बेहद अहम योगदान रहा है. जहां दुनियाभर के देश अपनी फैक्ट्रियों और गाड़ियों को दौड़ाने के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर रहे, वहीं खाड़ी देश पानी से लेकर खान-पान, शिक्षा से लेकर स्वास्थ और शहरीकरण से लेकर सुरक्षा के लिए अन्य देशों पर निर्भर है.

यूरोप और रूस से ज्यादा कमाई

विश्व बैंक का मानना है कि बीते कई दशकों के दौरान खाड़ी देशों में अन्य एशियाई देशों से अधिक माइग्रेशन हुआ. इसकी अहम वजह खाड़ी देशों में बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चरल प्रोजेक्ट है. कच्चे तेल की कमाई से खाड़ी देशों ने बड़ा हिस्सा अपने देश को विकसित करने पर खर्च किया. इसके विपरीत वैश्विक कारोबार में यूरोप और रूस लगातार कमजोर पड़ते रहे और उनकी फैक्ट्रियां ठप पड़ने लगी. इस दौरान चीन समेत भारत और अन्य एशियाई देशों ने तेज गति से अपना इंडस्ट्रिलाइजेशन किया. इसके साथ ही खाड़ी देश भारतीय नागरिकों के लिए रोजगार का एक अहम ठिकाना बनकर उभरा. विश्व बैंक के ताजे आंकड़ों के मुताबिक यूएई और अन्य खाड़ी देशों से रेमिटेंस के तौर पर 2017 में भारत को 69 बिलियन डॉलर मिले हैं.

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डॉलर में मिलने वाली यह रकम देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के साथ-साथ उन परिवारों के काम आता है जिनके परिजन खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं. लिहाजा, खाड़ी देशों से इस टैक्स फ्री इनकम के चलते देश में उन परिवारों का सामाजिक और आर्थिक स्तर भी सुधर रहे है जिनके करीबी यहां नौकरी कर रहे हैं.

केन्द्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक भारत-यूएई के बीच मजबूत आर्थिक संबंध है. दोनों देशों ने वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान 52 बिलियन डॉलर का कारोबार किया था. वैश्विक कारोबार में भारत यूएई की तीसरा बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है वहीं चीन और अमेरिका के बाद यूएई देश का तीसरा सबसे बड़े ट्रेडिंग पार्टनर है.

वहीं भारतीय उत्पाद के लिए यूएई एक बडा बाजार है. वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान भारत ने 30 बिलियन डॉलर का निर्यात यूएई को किया था.

खाड़ी देशों में 1960 के दशक में कच्चे तेल की खोज के बाद बड़ी संख्या में भारतीय मजदूरों का माइग्रेशन हुआ. शुरुआती दौर में यह माइग्रेशन मुंबई से दुबई के लिए हुआ और इनमें बड़ी संख्या में महाराष्ट्र से दुकानदार और छोटे-बड़े कारोबारी शामिल रहे. इसी दौरान यहां भारतीय परिवारों के लिए मंदिर और स्कूल तैयार किए गए इसके अलावा अरब मूल के भारतीय नागरिकों ने भी यहां का रुख किया. फिर 1970 और 1980 के दशक में यूएई कच्चे तेल बाजार का बड़ा खिलाड़ी बना और यहां भारतीयों की संख्या में तेज इजाफा हुआ.

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एक त्वरित अनुमान के मुताबिक जहां 1975 तक यूएई में 4,600 भारतीय नागरिक प्रति वर्ष जा रहे थे, 1985 तक यह बढ़कर सवा लाख का आंकड़ा पार कर गया. फिर 1999 तक यूएई का रुख दो लाख से अधिक लोग करने लगे. मौजूदा समय में भारतीय नागरिक यूएई में सबसे बड़ी आबादी है और इस आबादी में सबसे बड़ी संख्या तटीय राज्य केरल से है.

गौरतलब है कि यूएई में मौजूदा समय में 40 लाख भारतीयों में लगभग दस लाख भारतीय केरल से हैं. वहीं तमिलनाडु से लगभग 4.5 लाख भारतीय हैं. तीसरे नंबर पर ओडिशा से यूएई में 2 लाख भारतीय नागरिक मौजूद हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि केरल को यूएई से आ रहे रेमिटेंस का सबसे बड़ा फायदा पहुंच रहा है. इसके अलावा यूएई में बड़ी संख्या में ऐसे भारतीय मजदूर भी मौजूद हैं जिनके पास वहां रहने और काम करने के लिए जरूरी दस्तावेज मौजूद नहीं है.

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